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क्या है त्रिपुण्ड, कैसे और क्यों धारण किया जाता है इसे

Posted On: 20 Jul, 2015 Others में

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साधू-संतों, तपस्वियों और पंडितों के माथे पर चन्दन या भस्म से बना तीन रेखाएं कोई साधारण रेखाएं नहीं होती है. ललाट पर बना तीन रेखाओं को त्रिपुण्ड कहते है. हथेली पर चन्दन या भस्म को रखकर तीन उंगुलियों की मदद से माथे पर त्रिपुण्ड को लगाई जाती है. इन तीन रेखाओं में 27 देवताओं का वास होता है. यानी प्रत्यक रेखाओं में 9 देवताओं का वास होता हैं. जानिए त्रिपुण्ड से जुड़ी कुछ अनजानी और रोचक तथ्यों को…


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त्रिपुण्ड के देवताओं का नाम

ललाट पर लगा त्रिपुंड की पहली रेखा में नौ देवताओं का नाम इस प्रकार है. अकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी, धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रिया शक्ति, प्रात:स्वन, महादेव. इसी प्रकार त्रिपुंड की दूसरी रेखा में, ऊंकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्वगुण, यजुर्वेद, मध्यंदिनसवन, इच्छाशक्ति, अंतरात्मा, महेश्वर जी का नाम आता है. अंत में त्रिपुंड की तीसरी रेखा में मकार, आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तृतीयसवन, शिव जी वास करते हैं.


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त्रिपुण्ड धारण करने के तरीके

यह विचार मन में न रखें कि त्रिपुण्ड केवल माथे पर ही लगाया जाता है. त्रिपुण्ड हमारे शरीर के कुल 32 अंगों पर लगाया जाता है. इन अंगों में मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, ह्रदय, दोनों पाश्र्व भाग, नाभि, दोनों अण्डकोष, दोनों अरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैर शामिल हैं. इनमें अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, दस दिक्प्रदेश, दस दिक्पाल और आठ वसुओं वास करते हैं. सभी अंगों का नाम लेकर इनके उचित स्थानों में ही त्रिपुण्ड लगना उचित होता है.



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सभी अंगों पर अलग-अलग देवताओं का वास होता है. जैसे- मस्तक में शिव, केश में चंद्रमा, दोनों कानों में रुद्र और ब्रह्मा, मुख में गणेश, दोनों भुजाओं में विष्णु और लक्ष्मी, ह्रदय में शंभू, नाभि में प्रजापति, दोनों उरुओं में नाग और नागकन्याएं, दोनों घुटनों में ऋषिकन्याएं, दोनों पैरों में समुद्र और विशाल पुष्ठभाग में सभी तीर्थ देवता रूप में रहते हैं.


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वैज्ञानिक की नजर में त्रिपुण्ड

विज्ञान ने त्रिपुण्ड को लगाने या धारण करने के लाभ बताएं हैं. विज्ञान कहता है कि त्रिपुण्ड चंदन या भस्म से लगाया जाता है. चंदन और भस्म माथे को शीतलता प्रदान करता है. अधिक मानसिक श्रम करने से विचारक केंद्र में पीड़ा होने लगती है. ऐसे में त्रिपुण्ड ज्ञान-तंतुओं को शीतलता प्रदान करता है.Next…


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