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यहां रंगों से नहीं चिता-भस्म से खेली जाती है होली

Posted On: 4 Mar, 2015 Religious में

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होली का नाम सुनते ही आंखों के सामने रंग-बिरंगे गुलाल, पिचकारी और नाचने-गाने का दृश्य आने लगता है, लेकिन ऐसा सभी जगह नहीं होता. कुछ जगहों पर इस दिन रंगों के स्थान पर चिता-भस्म की होली खेली जाती है. यह कोई मजाक नहीं बल्कि देश की पौराणिक नगरी काशी का जीता-जागता सत्य है. लेकिन आखिरकार ऐसी मान्यता क्यों है, आइये जानते हैं.


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हिन्दू मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन की एकादशी के दिन ही बाबा विश्वनाथ देवी पार्वती का गौना कराकर दरबार लौटे थे. इस अवसर की खुशी प्रकट करते हुए काशी की गलियों में बाबा की पालकी निकाली जाती है. चारों ओर रंग ही रंग होता है, लेकिन अगले दिन का नजारा इससे बिलकुल अलग होता है जिसे देख पाना हर किसी के वश की बात नहीं है.


अगले दिन यहां महाश्मशान पर जलती चिताओं के बीच चिता-भस्म की होली खेली जाती है. यह सुनने में काफी अजीब लगता है लेकिन मान्यता है कि बाबा के औघड़ रूप को दर्शाने के लिए ही यहां चिता-भस्म का उपयोग होली के रंगों की तरह किया जाता है. हर तरफ ‘हर हर महादेव’ और डमरुओं की आवाज से यह नजारा काफी अनोखा प्रतीत होता है. यह दृश्य प्रति वर्ष काशी में दोहरायी जाती है.


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ऐसे खेलते हैं होली…


हर साल काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर लोगों द्वारा बाबा मशान नाथ को विधिवत भस्म, अबीर, गुलाल और रंग चढ़ाया जाता है. चारों तरफ बज रहे डमरुओं की आवाज के बीच भव्य आरती उतारी जाती है जिसके बाद धीरे-धीरे सभी डमरू बजाते हुए ही शमशान में चिताओं के बीच आ जाते हैं. यहां ‘हर हर महादेव’ कहते हुए लोग एक-दूसरे को चिता-भस्म लगाते हुए विचित्र होली खेलते हैं.


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स्थानीय लोगों का कहना है कि पौराणिक मान्यता के अनुसार ही काशी में चिता-भस्म की होली खेली जाती है. कहते हैं कि औघड़दानी बनकर बाबा खुद महाश्मशान में होली खेलते हैं और मुक्ति का तारक मंत्र देकर सबको तारते हैं. यह प्रथा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. इतना ही नहीं, यह भी मान्यता है कि स्वयं बाबा लोगों के बीच होली खेलते हैं.


इस दिन बाबा मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आयी सभी चिताओं की आत्मा को मुक्ति प्रदान करते हैं. इस दिन मशान नाथ मंदिर में घंटे और डमरुओं के बीच औघड़दानी रूप में विराजे बाबा की आरती उतारी जाती है. मान्यता यह भी है कि इस नगरी में प्राण छोड़ने वाला व्यक्ति शिवत्व को प्राप्त होता है. श्रृष्टि के तीनों गुण सत, रज और तम इसी नगरी में समाहित हैं.


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एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार महाश्मशान ही वो स्थान है जहां कई वर्षों की तपस्या के बाद भगवान शिव ने भगवान विष्णु को संसार के संचालन का वरदान दिया था. काशी के इसी घाट पर शिव ने मोक्ष प्रदान करने की प्रतिज्ञा ली थी. इसलिए तो यह दुनिया की एकमात्र ऐसी नगरी है जहां मनुष्य की मृत्यु को भी मंगल माना जाता है. यहां शव यात्रा में वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं. Next….


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